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मंगलवार, 15 अगस्त 2023

माता-पिता का प्यार कहानी

कहानी-माता-पिता के प्रति हमारी क्या भूमिका है?

माता-पिता का प्यार

एक बार की बात है, एक गाँव में जैरी नाम का एक बूढ़ा आदमी रहता था। उसका बेटा शहर में रहता था और वो काफी वर्षो से अपने बेटे से नहीं मिला था । वह अपने बेटे से मिलने एक लंबी यात्रा कर उस शहर में पहुँच गया, जहाँ उसका बेटा काम करता था। वह उस जगह पहुँच गया, जहाँ से उसे बहुत पहले बेटे के पत्र मिलते थे। उसने बड़े उत्साह और खुशी से वहाँ दरवाजा खटखटाया।

दुर्भाग्य से, दरवाजा किसी और ने खोला। जैरी ने पूछा, "मुझे लगा कि थॉमस इस जगह रहता है?"

उस व्यक्ति ने कहा, "नहीं! थॉमस अब यहाँ नहीं रहता, वह यहाँ से चला गया है और दूसरी जगह शिफ्ट हो गया है।"

जैरी निराश हो गया और बस यही सोचता रहा कि अपने बेटे से कैसे मिलूँ।

जैरी नजदीक गली में चलकर पड़ोसियों से पूछताछ करने लगा।
"क्या आप थॉमस को ढूँढ रहे हैं?" एक पड़ोसी ने पूछा। जैरी ने सिर हिलाकर हाँ में जवाब दिया तो पड़ोसी ने थॉमस का नए घर और कार्यालय का पता जैरी को दे दिया। जैरी ने उसे धन्यवाद दिया और पड़ोसी के बताए रास्ते की ओर चल पड़ा ।

जैरी बेटे के कार्यालय गया और रिसेप्शन काउंटर पर पूछा, "क्या आप कृपया मुझे इस कार्यालय में थॉमस कहाँ मिलेगा, यह बता सकते हैं?"

रिसेप्शनिस्ट ने पूछा, "क्या मैं जान सकती हूँ कि आप उसे कैसे जानते हैं?"

जैरी ने विनम्रता से जवाब दिया, "मैं उसका पिता हूँ।"

रिसेप्शनिस्ट ने जैरी को कुछ देर रुकने के लिए कहा और थॉमस को फोन कर उसके पिता के आगमन के बारे में बताया। थॉमस चौंक गया और उसने रिसेप्शनिस्ट से कहा कि, "वह उसके पिता को तुरंत उसके केबिन में भेज दे।"

जैरी ने केबिन में प्रवेश किया और जब उन्होंने थॉमस को देखा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। थॉमस भी अपने पिता को देखकर खुश हुआ। उन्होंने थोड़ी देर के लिए औपचारिक बातचीत की और फिर जैरी ने थॉमस से पूछा, "बेटा! तुम्हारी माँ तुमसे मिलना चाहती है। क्या तुम मेरे साथ घर चलोगे?"
 
थॉमस ने जवाब दिया, "नहीं पिताजी। मैं घर नहीं आ सकता। मैं अपने प्रमोशन के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम करने में बहुत व्यस्त हूँ और अभी मुझे छुट्टी मिलनी बहुत मुश्किल है।"

जैरी ने मुस्कराते हुए कहा, "ठीक है! तुम अपने काम पर ध्यान दो। मैं आज शाम को अपने गाँव वापस जा रहा हूँ।"

थॉमस ने पूछा, "आप मेरे साथ कुछ दिन रुक सकते हैं।"

एक पल की चुप्पी के बाद जैरी ने जवाब दिया, "बेटा, तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो। मैं तुमको असहज नहीं करना चाहता या तुम पर बोझ नहीं बनना चाहता। मुझे कभी तुमसे दोबारा मिलने का मौका मिला, तो मुझे खुशी होगी।" और यह कहकर वह वहाँ से चले गये।

कुछ हफ्तों के बाद, थॉमस को अहसास हुआ कि उसके पिता इतने लंबे समय के बाद अकेले उससे मिलने क्यों आए। उसे अपने पिता के साथ सही तरह से व्यवहार नहीं करने के लिए ग्लानि भी हुई। उसने इसके लिए अपने आप को दोषी महसूस किया और कुछ दिनों के लिए कार्यालय से छुट्टी लेकर अपने पिता से मिलने के लिए अपने गाँव चला गया। जब वह गाँव में उस स्थान पर गया जहाँ वह पैदा और बड़ा हुआ,तो उसने देखा कि उसके माता-पिता वहाँ नहीं थे। वह चौंक गया और पड़ोसियों से पूछा, “मेरे माता-पिता यहीं रहते थे,अब वे कहाँ गए?"

पड़ोसियों ने उसे उस जगह का पता दिया, जहाँ उसके माता-पिता रह रहे थे।

थॉमस जब उस स्थान तक पहुँचा तो उसने दूर से देखा कि वह स्थान एक  कब्रिस्तान जैसी सुनसान जगह है। थॉमस की आँखों में आँसू भर आए और वह धीरे-धीरे उस स्थान की ओर चलने लगा। उसके पिता जैरी ने थॉमस को बहुत दूर से देख लिया और वे उसे जोर से पुकारने लगे। थॉमस ने अपने पिता को देखा और दौड़कर उन्हें गले से लगा लिया।

जैरी ने पूछा, "तुम कैसे हैं? तुमको यहाँ देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम यहाँ पर आओगे।"

थॉमस को शर्मिंदगी महसूस हुई और वो अपना सिर नीचे करके खड़ा रहा। जैरी ने कहा, “तुम्हें बुरा क्यों लग रहा है। क्या कुछ गलत हुआ है?” थॉमस ने जवाब दिया, "नहीं पिताजी, मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि मैं आपसे इस हालात में मिलूँगा।"

जैरी मुस्कुराया और कहा, "जब तुम अपनी कॉलेज शिक्षा के लिए शहर गए थे, तब मैंने एक ऋण लिया था। फिर जब तुमको एक नई कार चाहिए थी, तब भी मैंने एक कर्ज लिया। लेकिन खेती में नुकसान के कारण, मैं ऋण नहीं चुका पाया। तब मैंने तुमसे मदद के लिए संपर्क करने के बारे में सोचा, लेकिन तुम अपने काम में बहुत व्यस्त और तनावग्रस्त थे। मैं बस तुम पर इस समस्या का बोझ नहीं डालना चाहता था और चुप रहा और मुझे कर्ज चुकाने के लिए अपना मकान बेचना पड़ा।”

थॉमस रूंघे गले से बोला, "आप मुझे पहले ये सब बता सकते थे। मैं बाहरी व्यक्ति नहीं हूँ।" जैरी ने कहा, "तुम बहुत व्यस्त थे और अपने काम के कारण तनावग्रस्त थे, जिस कारण मैं चुप रहा। हमें तो बस तुम्हारी खुशी चाहिए थी। इसलिए हम चुप रहे।"

थॉमस रोने लगा और अपने पिता को फिर से गले लगा लिया। उसे अपने पिता से किये व्यवहार पर बहुत ग्लानि हुई और वो अपनी गलती के लिए माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगा। जैरी मुस्कुराया और कहा, "इसकी कोई जरूरत नहीं है। मुझे अब जो मिला है, उससे मैं खुश हूँ। मैं बस इतना चाहता हूँ कि तुम हमारे लिए कुछ समय निकालो, हम तुमसे बहुत प्यार करते हैं और इस बुढ़ापे में तुमसे मिलने के लिए यात्रा करना अब हमारे लिए मुश्किल है। ”

 बच्चों के लिए माता-पिता ही सब कुछ होते हैं।

माता-पिता हमेशा आपके साथ खड़े रहेंगे और आपको खुश करने के लिए वे सब कुछ करेंगे  जो वे कर सकते हैं। हम उन्हें अक्सर तब तक हल्के में लेते हैं, जब तक बहुत देर नहीं हो जाती। वे हमारे लिए जो कुछ भी करते हैं, उसकी हम कद्र नहीं करते हैं। जब हम अपने जीवन में सफलता का मार्ग खोज कर आगे बढ़ रहे होते हैं, तब हमें अपने माता-पिता को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वे ही हमारी सफलता का असली कारण हैं।

                               ♾️

"जब हमारे अस्तित्व की स्थायी दशा प्रेम होगी, तब निवेश की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। जब निवेश की आवश्यकता शून्य हो जाती है तो इसका अर्थ यह है कि यह सबसे स्थायी रिश्ता है, सबसे स्थायी परिवार है ।"*      

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

Motivational Stories

 Motivational Stories

 बड़ा काम छोटा काम

पिता का आशीर्वाद 

मन को छूने वाला प्रसंग 

रिश्ते हैं प्यार के ..  

सम्मान की इच्छा  

अपना काम स्वयं करिए  

 जन्मदिन का उपहार

Email-id | मेल आईडी 

 

 

बड़ा काम छोटा काम

*आज का प्रेरक प्रसङ्ग*

        !! *बड़ा काम छोटा काम* !!
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*शहर की मेन मार्केट में  एक  गैराज  था  जिसे  "रौशन"  नाम  का  मैकेनिक चलाता  था । वैसे  तो  "रौशन"  एक अच्छा आदमी  था  लेकिन  उसके  अन्दर  एक  कमी  थी, वो  अपने  काम  को  बड़ा  और दूसरों  के  काम  को  छोटा  समझता  था। एक  बार  एक  हार्ट  सर्जन  अपनी  लक्ज़री कार लेकर  उसके  यहाँ  सर्विसिंग  कराने  पहुंचे. बातों -बातों  में  जब "रौशन" को  पता  चला  की  कस्टमर  एक  हार्ट  सर्जन  है  तो  उसने  तुरन्त  पूछा ,  "डॉक्टर साहब"  मैं  ये  सोच रहा  था  कि हम  दोनों  के  काम एक  जैसे  हैं… !”*

*“एक  जैसे  ! वो  कैसे ?” , सर्जन  ने थोडा अचरज से पूछा . “देखिये  साहब ,”रौशन" कार  के कौम्प्लिकेटेड इंजन  पर  काम  करते  हुए  बोला :  “ ये  इंजन  कार  का  दिल  है  , मैं  चेक  करता  हूँ  की  ये  कैसा  चल  रहा  है , मैं  इसे  खोलता  हूँ  , इसके  वाल्वस फिट करता  हूँ , अच्छी तरह  से  सर्विसिंग  कर  के  इसकी प्रोब्लम्स ख़तम  करता  हूँ  और  फिर  वापस  जोड़  देता  हूँ …आप  भी  कुछ  ऐसा  ही  करते  हैं ; क्यों? “हम्म ” सर्जन  ने  हामी  भरी ।*

*“तो  ये  बताइए  की  आपको  मुझसे  10 गुना  अधिक  पैसे  क्यों  मिलते  हैं? काम तो आप भी मेरे जैसा ही करते हैं ?”   "रौशन"  ने  खीजते  हुए पूछा : सर्जन  ने  एक क्षण सोचा  और  मुस्कुराते  हुए बोले : “ जो  तुम  कर  रहे  हो  उसे चालू इंजन  पर  कर के  देखो, समझ  जाओगे .”! "रौशन" को इससे पहले किसी ने ऐसा जवाब नहीं दिया था ! अब वह अपनी गलती समझ चुका था।*


*शिक्षा*

*Friends, हर एक  काम की  अपनी  importance होती  है , अपने  काम  को  बड़ा समझना ठीक  है  पर  दूसरों  के  काम  को  कभी  छोटा  नहीं  समझना  चाहिए। हम  औरों  के  काम  के  बारे  में  बस उपरी तौर पे  जानते  हैं  लेकिन  उसे  करने  में  आने  वाले  challenges के  बारे  में  हमें  कुछ  ख़ास  नहीं  पता  होता । इसलिए  किसी  के  काम  को  छोटा  नहीं  समझें  और  सभी  का सम्मान करें।*🌹🌹🌹🌹🌹

गुरुवार, 29 जून 2023

पिता का आशीर्वाद

*💐पिता का आशीर्वाद 💐*

*एक व्यापारी की यह सत्य घटना है।*
 जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि.. 
बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है। 
तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।
बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।
अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। 
धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।
अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है। 
क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। 
और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी। 
एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?
धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।
इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद! 
धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।
ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता। 
एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।
तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो। 
मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।
तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।
जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं। 
भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।
परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।
नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।
जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को। 
उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।
उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?
उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।
सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं। 
सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा।
धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है। 
उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।
सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई। 
अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।
धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।
सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है। 
मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।
इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।
धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!
सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।
जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?
धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं। 
मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।
सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?
धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें। 
उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।
ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..
धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।
अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।
धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।
सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।
धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।
सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी। 
*पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।*
बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।

*अपने बुजुर्गों🙌 का सम्मान 🙏करें! यही 🚩भगवान की सबसे बड़ी सेवा है.

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

मन को छूने वाला प्रसंग

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       🌐"मन को छूने वाला प्रसंग"🌐
     


एक बार मेरे शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् "ज्योतिषी" का आगमन हुआ..!! माना जाता है कि उनकी वाणी में सरस्वती विराजमान है। वे जो भी बताते है वह 100% सच होता है।
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501/- रुपये देते हुए " प्रेमचंद जी" ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषी को कहा.., "महाराज, मेरी मृत्यु कब, कहॉ और किन परिस्थितियों में होगी?"
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ज्योतिषी ने प्रेमचंद जी की हस्त रेखाऐं देखीं, चेहरे और माथे को अपलक निहारते रहे। स्लेट पर कुछ अंक लिख कर जोड़ते-घटाते रहे। बहुत देर बाद वे गंभीर स्वर में बोले.., "प्रेमचंद जी, आपकी भाग्य रेखाएँ कहती है कि जितनी आयु आपके पिता को प्राप्त होगी उतनी ही आयु आप भी पाएँगे। जिन परिस्थितियों में और जहाँ आपके पिता की मृत्यु होगी, उसी स्थान पर ओर उसी तरह, आपकी भी मृत्यु होगी।"
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यह सुन कर "प्रेमचंद जी" भयभीत हो उठे और वहां से चल पडे..

एक घण्टे बाद ...
प्रेमचंद जी" वृद्धाश्रम से अपने वृद्ध पिता को साथ लेकर घर लौट रहे थे..!!

नोट :- आप को वही मिलेगा..जैसे अपने माँ-बाप से साथ सलूक करोगे ! यहीं विधि का विधान है !!

रविवार, 16 अप्रैल 2023

रिश्ते हैं प्यार के ..

.           रिश्ते हैं प्यार के ...👭
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बहुत ही अनमोल कहानी...
थोड़ा बड़ा पोस्ट है, पर एक बार जरूर पढ़ियेगा ।।

पिताजी जोऱ से चिल्लाते हैं....... ।
मैं दौड़कर आता हू , और पूछता हु । क्या बात है पिताजी ?

पिताजी - तूझे पता नहीं है, आज तेरी बहन आ रही है ? वह इस बार हम सभी के साथ अपना जन्मदिन मनायेगी ।

अब जल्दी से जा और अपनी बहन को लेके आ,हाँ और सुन... तू अपनी नई गाड़ी लेकर जा जो तूने कल खरीदी है... उसे अच्छा लगेगा

मैं - लेकिन मेरी गाड़ी तो मेरा दोस्त ले गया है सुबह ही... और आपकी गाड़ी भी ड्राइवर ये कहकर ले गया कि गाड़ी की ब्रेक चेक करवानी है।

पिताजी - ठीक है तो तू स्टेशन तो जा किसी की गाड़ी लेकर या किराया की करके ? उसे बहुत खुशी मिलेगी ।

मै - अरे वह बच्ची है क्या जो आ नहीं सकेगी? आ जायेगी आप चिंता क्यों करते हो कोई टैक्सी या आटो लेकर----

पिताजी - तूझे शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए? घर मे गाड़ियाँ होते हुए भी घर की बेटी किसी टैक्सी या आटो से आयेगी?

मैं - ठीक है आप जाओ मुझे बहुत काम है मैं जा नहीं सकता ।

पिताजी - तूझे अपनी बहन की थोड़ी भी फिकर नहीं? शादी हो गई तो क्या बहन पराई हो गई ? क्या उसे हम सबका प्यार पाने का हक नहीं? तेरा जितना अधिकार है इस घर में , उतना ही तेरी बहन का भी है। कोई भी बेटी या बहन मायके छोड़ने के बाद पराई नहीं होती।

मैं - मगर मेरे लिए वह पराई हो चुकी है और इस घर पर सिर्फ मेरा अधिकार है ।

तडाक ...... तडाक.....

अचानक पिताजी का हाथ उठ जाता है मुझपर और तभी माँ आ जाती है ।

मम्मी - आप कुछ शरम तो कीजिए ऐसे जवान बेटे पर हाँथ बिलकुल नहीं उठाते।

पिताजी - तुमने सुना नहीं इसने क्या कहा ? अपनी बहन को पराया कहता है ये वही बहन है जो इससे एक पल भी जुदा नहीं होती थी- हर पल इसका ख्याल रखती थी। पाकेट मनी से भी बचाकर इसके लिए कुछ न कुछ खरीद देती थी। बिदाई के वक्त भी हमसे ज्यादा अपने भाई से गले लगकर रोई थी। और ये आज उसी बहन को पराया कहता है।

मैं - (मुस्कुराकर) "बुआ का भी तो आज ही जन्मदिन है ना पापा" वह कई बार इस घर मे आई है "मगर हर बार अॉटो से आई है ".आपने कभी भी अपनी गाड़ी लेकर उन्हें लेने नहीं गये....

माना वह आज वह तंगी मे है मगर कल वह भी बहुत अमीर थी । आपको मुझको इस घर को उन्होंने दिल खोलकर सहायता और सहयोग किया है। बुआ भी इसी घर से बिदा हुई थी फिर रश्मि दी और बुआ मे फर्क कैसा। रश्मि मेरी बहन है तो बुआ भी तो आपकी बहन है।

"पापा" आप मेरे मार्गदर्शक हो आप मेरे हीरो हो मगर बस इसी बात से मैं हरपल अकेले में रोता हूँ। की..तभी बाहर गाड़ी रूकने की आवाज आती है.... ।

तब तक पापा भी मेरी बातों से पश्चाताप की आग मे जलकर रोने लगे और इधर मैं भी कि दीदी दौड़कर पापा मम्मी से गले मिलती है..लेकिन उनकी हालत देखकर पूछती है कि क्या हुआ पापा ?

पापा - तेरा भाई आज मेरा भी पापा बन गया है ।

रश्मि - ए पागल... !! नई गाड़ी न? बहुत ही अच्छी है मैंने ड्राइवर को पीछे बिठाकर खुद चलाके आई हूँ और कलर भी मेरी पसंद का है।

मैं - "happy birthday to you Di..."
वह गाड़ी आपकी है और हमारे तरफ से आपको "birthday gift.."!

बहन सुनते ही खुशी से उछल पड़ती है कि तभी "बुआ" भी अंदर आती है

बुआ - क्या भैया आप भी न ? न फोन न कोई खबर , अचानक भेज दी गाड़ी आपने, भागकर आई हूँ खुशी से "ऐसा लगा कि पापा आज भी जिंदा हैं .."

इधर पिताजी अपनी पलकों मे आँसू लिये मेरी ओर देखते हैं..और मैं पापा को चुप रहने का इशारा करता हु ।

इधर बुआ कहती जाती है कि मैं कितनी भाग्यशाली हूँ । कि "मुझे बाप जैसा भैया मिला," ईश्वर करे मुझे हर जन्म मे आप ही भैया मिले...

"पापा -मम्मी को पता चल गया था कि..ये सब प्रिंस की करतूत है,मगर आज फिर एक बार रिश्तों को मजबूती से जुड़ते देखकर वह अंदर से खुशी से टूटकर रोने लगे। उन्हें अब पूरा यकीन था कि...मेरे जाने के बाद भी मेरा बेटा रिश्तों को सदा हिफाजत से रखेगा..

"बेटी और बहन"

ये दो बेहद अनमोल शब्द हैं जिनकी उम्र बहुत कम होती है । क्योंकि शादी के बाद बेटी और बहन किसी की पत्नी तो किसी की भाभी और किसी की बहू बनकर रह जाती है। शायद.... लड़कियाँ इसी लिए मायके आती होंगी कि...

उन्हें फिर से "बेटी और बहन" शब्द सुनने को बहुत मन करता होगा !!

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

अपनी तुलना दूसरों से न करें"

.  🔺"अपनी तुलना दूसरों से न करें"🔺
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एक बार की बात है, किसी जंगल में एक कौवा रहता था, वो बहुत ही खुश था, क्योंकि उसकी ज्यादा इच्छाएं नहीं थीं। वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट था, लेकिन एक बार उसने जंगल में किसी हंस को देख लिया और उसे देखते ही सोचने लगा कि ये प्राणी कितना सुन्दर है, ऐसा प्राणी तो मैंने पहले कभी नहीं देखा! इतना साफ और सफेद। यह तो इस जंगल में औरों से बहुत सफेद और सुंदर है, इसलिए यह तो बहुत खुश रहता होगा।

कोवा हंस के पास गया और पूछा, भाई तुम इतने सुंदर हो, इसलिए तुम बहुत खुश होगे?

इस पर हंस ने जवाब दिया, हां मैं पहले बहुत खुश रहता था, जब तक मैंने तोते को नहीं देखा था। उसे देखने के बाद से लगता है कि तोता धरती का सबसे सुंदर प्राणी है। हम दोनों के शरीर का तो एक ही रंग है लेकिन तोते के शरीर पर दो-दो रंग है, उसके गले में लाल रंग का घेरा और वो सूर्ख हरे रंग का था, सच में वो बेहद खूबसूरत था।

अब कौवे ने सोचा कि हंस तो तोते को सबसे सुंदर बता रहा है, तो फिर उसे देखना होगा।

कौवा तोते के पास गया और पूछा, भाई तुम दो-दो रंग पाकर बड़े खुश होगे?

इस पर तोते ने कहा, हां मैं तब तक खुश था जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था। मेरे पास तो दो ही रंग हैं लेकिन मोर के शरीर पर तो कई तरह के रंग हैं।

अब कौवे ने सोचा सबसे ज्यादा खुश कौन है, यह तो मैं पता करके ही रहूंगा। इसलिए अब मोर से मिलना ही पड़ेगा। कौए ने मोर को जंगल में ढूंढा लेकिन उसे पूरे जंगल में एक भी मोर नहीं मिला और मोर को ढूंढते-ढूंढते वह चिड़ियाघर में पहुंच गया, तो देखा मोर को देखने बहुत से लोग आए हुए हैं और उसके आसपास अच्छी खासी भीड़ है।

सब लोगों के जाने के बाद कौवे ने मोर से पूछा, भाई तुम दुनिया के सबसे सुंदर जीव हो और रंगबिरंगे हो, तुम्हारे साथ लोग फोटो खिंचवा रहे थे। तुम्हें तो बहुत अच्छा लगता होगा और तुम तो दुनिया के सबसे खुश जीव होगे?

इस पर मोर ने दुखी होते हुए कहा, भाई अगर सुंदर हूं तो भी क्या फर्क पड़ता है! मुझे लोग इस चिड़ियाघर में कैद करके रखते हैं, लेकिन तुम्हें तो कोई चिड़ियाघर में कैद करके नहीं रखता और तुम जहां चाहो अपनी मर्जी से घूम-फिर सकते हो। इसलिए दुनिया के सबसे संतुष्ट और खुश जीव तो तुम्हें होना चाहिए, क्योंकि तुम आज़ाद रहते हो। कौवा हैरान रह गया, क्‍योंकि उसके जीवन की अहमियत कोई दूसरा बता गया।

दोस्तों, ऐसा ही हम लोग भी करते हैं। हम अपनी खुशियों और गुणों की तुलना दूसरों से करते हैं, ऐसे लोगों से जिनका रहन-सहन का माहौल हमसे बिलकुल अलग होता है। हमारी जिंदगी में बहुत सारी ऐसी चीज़ें होती हैं, जो केवल हमारे पास हैं, लेकिन हम उसकी अहमियत समझकर खुश नहीं होते। लेकिन दूसरों की छोटी ख़ुशी भी हमें बड़ी लगती है, जबकि हम अपनी बड़ी खुशियों को इग्नोर कर देते हैं।

सोमवार, 10 अप्रैल 2023

सम्मान की इच्छा

सम्मान की इच्छा

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे ।
रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु, एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?

श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो ।

तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को उन्हीने सोने का बना दिया और बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो ।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया ।
उसने सभी गाँव वालों को बुलाया और सोना बांटना शुरू कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी ।
अर्जुन, सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए ।
लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे । इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे ।

जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी ।

उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण को बुला लिया और उससे कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो ।

कर्ण ने पहाड़ की तरफ देखा। गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा, यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये । ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए ।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया ?

इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि,"तुम्हे सम्मान प्राप्त करने की इच्छा के कारण, तुम स्वयं पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था।

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए ।
वह नहीं चाहते थे कि उनके मन में यह इच्छा नहीं थी कि कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे।

उनके पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

सार :-
दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है ।
यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के साथ करना चाहिए।

अपना काम स्वयं करिए

.      ☀️ "अपना काम स्वयं करिए" ☀️

एक बुद्धिमान लवा पक्षी का परिवार किसान के खेतों में रहता था। उनका घोंसला बहुत आरामदेह था। परिवार में सभी सदस्यों में अथाह प्रेम था

एक सुबह अपने बच्चों के लिए भोजन की तलाश में जाने से पहले बच्चों की मां ने कहा- देखो बच्चों किसान बहुत जल्दी अपनी फसल काट कर आएगा। ऐसी स्थिति में हमें अपना नया घर खोजना पड़ेगा। तो तुम सब अपने कान और आंखें खुली रखना और जब मैं शाम को लौटकर आऊं तो मुझे बताना कि तुमने क्या देखा और क्या सुना?

शाम को जब लवा अपने घर लौटी तो उसने अपने परिवार को परेशान हाल में पाया। उसके बच्चे कहने लगे- हमें जल्दी ही यह स्थान छोड़ देना चाहिए। किसान अपने पुत्रों के साथ अपने खेत की जांच करने आया था। वह अपने पुत्रों से कह रहा था। फसल तैयार है, हमें कल अपने सभी पड़ोसियों को बुलाकर फसल काट लेनी चाहिए।

लवा ने अपने बच्चों की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं, फिर बोली- अरे कोई खतरा नही। कल भी होशियार रहना। किसान जो कुछ करे या कहे, वह मुझे शाम को बताना।

दूसरे दिन शाम को जब लवा वापस लौटी तो उसने अपने बच्चों को बहुत भयभीत पाया। मां को देखते ही वे चिल्लाए- किसान दुबारा यहां आया था। कह रहा था, यह फसल जल्दी ही काटी जानी चाहिए। अगर हमारे पड़ोसी हमारी सहायता नहीं करते तो हम अपने रिश्तेदारों को बुलाएंगे। जाओ, अपने चाचा और चचेरे भाइयों आदि से कहो कि कल आकर फसल काटने में हमारी सहायता करें।

लवा मुस्कराई बोली- प्यारे बच्चों चिन्ता मत करो। किसान के रिश्तेदारों के पास तो उनकी अपनी ही फसल काटने के लिए पड़ी है। वे भला यहां फसल काटने क्यों आएंगे।

अगले दिन लवा फिर बाहर चली गई। जब वह शाम को लौटी तो बच्चे उसे देखते ही चिल्लाए- ओह मां यह किसान आज कह रहा था कि यदि उसके रिश्तेदार और पड़ोसी फसल काटने नहीं आते तो वह खुद अपनी फसल काटेगा। तो अब तो यहां रहने का कोई लाभ नहीं है।

तब तो हमें शीघ्र ही यहां से चलना चाहिए। लवा बोली- यह मैं इसलिए कह रही हूं कि जब कोई किसी कार्य के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह कार्य कभी पूरा नहीं होता। परंतु वही व्यक्ति जब उस कार्य को स्वयं करने की ठान लेता है तो संसार की कोई भी शक्ति उसे उस कार्य को करने से नहीं रोक सकती। तो यही वह समय है,जब हमें अपना घर बदल लेना चाहिए।

शिक्षा- यदि अपना काम स्वयं करने की आदत खुद में विकसित कर लें,तो हर क्षेत्र में सफलता की उम्मीद रहेगी.

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

Birthday Gift | जन्मदिन का उपहार | A Short Story | Motivational Story

 
जन्मदिन  का  उपहार

 

Heart touching. Must read 

जन्मदिन  का  उपहार

मैं सुचित्रा, आज मेरा जन्मदिन है।

सचिन ने सुबह ही कहा :- "आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे। तुम्हारे जन्मदिन पर आज तुम्हें एक अनोखी ट्रीट मिलेगी।"

15 साल हो गए हमारी शादी को। मैं सचिन को बहुत अच्छे से जानती हूँ। दोनों बच्चे शाम 4 बजे स्कूल से लौटेंगे यानी लंच पर मैं और सचिन ही जाएँगे और बच्चों के आने से पहले लौट भी आएँगे।

एक नए बने मॉल की पार्किंग में हमारी गाड़ी पहुँची। 

5वी मंजिल पर खाने पीने के ढेरों स्टॉल्स थे  फाइनली एक बंद द्वार पर हम पहुँचे। द्वार पर एक बोर्ड लगा था, जिसपर लिखा था : “Dialogue in the dark”

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। "अंधेरे में संवाद"? ये कैसा नाम है, रेस्टॉरेंट का?

बड़ा विचित्र लग रहा था सब कुछ।  अगले मोड़ के बाद इतना अंधेरा हो गया कि, मैंने सचिन का हाथ पकड़ लिया और  फिर शायद हम एक हॉल में पहुँचे।

एक सूटबूट धारी आदमी ने किसी को आवाज लगाई :- "संपत।"

“ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। आज मैडम का बर्थडे है। गिव देम स्पेशल ट्रीट। ऑर्डर मैंने ले लिया है, तुम इन्हें इनकी टेबलपर लेकर जाओ। अब उस दूसरे आदमी संपत ने हमारे हाथ थामे और हमें टेबल पर पहुँचाया।  हम बैठ गए। मैंने सामने टेबल पर हाथ फिराया। जब टेबल ही नहीं दिख रहा तो खाना कैसे दिखेगा? हम खाना कैसे खाएँगे?  ये कैसा जन्मदिन का उपहार है? ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे दिमाग में घुमड़ रहे थे। लेकिन मुझे सचिन पर भरोसा था फिर टेबल पर प्लेट्स आदि सजाए जाने की आवाजें आने लगीं। वेटर्स का आना जाना समझ में आ रहा था। फिर वो प्लेट्स में खाना सर्व करने लगा।

"मैंने परोस दिया है। अब आप लोग शुरू कीजिए। आपको कुछ दिखेगा नहीं लेकिन मुझे विश्वास है कि, स्पर्श और खुशबू से आपको खाने में एक अलग ही आनंद प्राप्त होगा।"

उस घनघोर अंधेरे में मैंने रोटी तोड़ी, प्लेट में रखी सब्जी को लपेटा और पहला निवाला लिया। उल्टे हाथ से मैंने प्लेट पकड़ी हुई थी अतः प्रत्येक पदार्थ की जगह सीधे हाथ के स्पर्श से मुझे ज्ञात हो रही थी।

और फिर, आहा... अंधेरे में भी  खाने के पदार्थ तो अपने स्वाद का मजा दे ही रहे थे लेकिन साथ ही  मैं पूछ रही थी और ऐसे ही सचिन मुझसे पूछता जा रहा, खुशबू, स्पर्श और आवाज बस यही काम कर रहे थे। बीच बीच में संपत, सब्जियाँ या अन्य कुछ और परोस देता। मेरा जन्मदिन, अंधेरे में लंच, एक अनोखा आनंद दे गया कैंडल लाइट डिनर से भी अधिक आनंददायक रहा।

"आप जब, बाहर जाना चाहें तो बताइएगा। मैं आपको बाहर छोड़ आऊँगा।" ---संपत ने कहा। तो सचिन बोल पड़ा : "हाँ.... हाँ.... अब चलो। बिल भी तो बाहर ही पे करना है। चलो संपत, ले चलो हमें।" फिर संपत ने हम दोनों के हाथ थामे और हमें बाहर को ले चला। अंधेरे हॉल से बाहर निकल हमें दो मोड़ों के बाद प्रकाश दिखने लगा और हम संपत का हाथ छोड़ उसके पीछे चलते रहे।

उसका आभार मानने के लिए मैंने उसे आवाज लगाई तो संपत पलटा और मेरी ओर देखने लगा। तब कमरे के प्रकाश में मैंने संपत का चेहरा देखा और मेरे मुँह से हल्की चीख निकल गई क्योंकि, संपत की आँखों की जगह दो अंधेरे गढ्ढे नजर आ रहे थे। वो पूर्ण रूप से अँधा था।

संपत बोला :- “यस मैडम?”

मैं समझ नहीं पा रही थी कि,क्या कहूँ? फिर मैंने कहा :- "संपत, अपनी ऐसी हालत में भी तुमने, हमारी खूब सेवा, इतनी बढ़िया खातिरदारी की। मैं ये बात सारी जिंदगी नहीं भूलूँगी।"

संपत :- "मैडम, आपने जिस अंधेरे को आज अनुभव किया है वो तो हमारा रोज का ही है। लेकिन हमने उसपर विजय पा ली है। We are not disabled, we are differently able people. We can lead our life without any problem with all joy and happiness as you enjoy.”

बिना किसी की सहानुभूति के मोहताज एक सशक्त व्यक्ति से आज सचिन ने मुझे मिलवाया। ऐसा जन्मदिन मुझे कभी नहीं भूलेगा।

सचिन बिल देकर मेरे पास आया हमेशा सचिन को उसकी फिजूलखर्ची के चिल्लाने वाली मैंने, बिल को देखा तो मेरी नजर बिल पर सबसे नीचे लिखे प्रिंटेड शब्दों पर ठहर गई.......

लिखा था : We do not accept tips, Please think of donating your eyes, which will bring light to somebody’s life.

(हम टिप्स स्वीकार नहीं करते। कृपया अपने नेत्रदान के बारे में सोचें, जो किसी के जीवन में रोशनी ले आएगा।)

नेत्रदान महादान

आपको यह कहानी कैसी लगी? मुझे कमेंट बॉक्स में लिखकर बताइए। 

धन्यवाद।

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