नमस्कार मित्रों, मैं दिनेश कुमार शर्मा आप सभी का इस ब्लॉग पर स्वागत करता हूँ। मेरे इस ब्लॉग में कई तरह के विषय शामिल किए गए हैं जो एक पाठक वर्ग के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होंगे।
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मंगलवार, 15 अगस्त 2023
माता-पिता का प्यार कहानी
मंगलवार, 4 जुलाई 2023
बड़ा काम छोटा काम
गुरुवार, 29 जून 2023
पिता का आशीर्वाद
सोमवार, 17 अप्रैल 2023
मन को छूने वाला प्रसंग
🌐"मन को छूने वाला प्रसंग"🌐
एक बार मेरे शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् "ज्योतिषी" का आगमन हुआ..!! माना जाता है कि उनकी वाणी में सरस्वती विराजमान है। वे जो भी बताते है वह 100% सच होता है।
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501/- रुपये देते हुए " प्रेमचंद जी" ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषी को कहा.., "महाराज, मेरी मृत्यु कब, कहॉ और किन परिस्थितियों में होगी?"
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ज्योतिषी ने प्रेमचंद जी की हस्त रेखाऐं देखीं, चेहरे और माथे को अपलक निहारते रहे। स्लेट पर कुछ अंक लिख कर जोड़ते-घटाते रहे। बहुत देर बाद वे गंभीर स्वर में बोले.., "प्रेमचंद जी, आपकी भाग्य रेखाएँ कहती है कि जितनी आयु आपके पिता को प्राप्त होगी उतनी ही आयु आप भी पाएँगे। जिन परिस्थितियों में और जहाँ आपके पिता की मृत्यु होगी, उसी स्थान पर ओर उसी तरह, आपकी भी मृत्यु होगी।"
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यह सुन कर "प्रेमचंद जी" भयभीत हो उठे और वहां से चल पडे..
एक घण्टे बाद ...
प्रेमचंद जी" वृद्धाश्रम से अपने वृद्ध पिता को साथ लेकर घर लौट रहे थे..!!
नोट :- आप को वही मिलेगा..जैसे अपने माँ-बाप से साथ सलूक करोगे ! यहीं विधि का विधान है !!
रविवार, 16 अप्रैल 2023
रिश्ते हैं प्यार के ..
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बहुत ही अनमोल कहानी...
थोड़ा बड़ा पोस्ट है, पर एक बार जरूर पढ़ियेगा ।।
पिताजी जोऱ से चिल्लाते हैं....... ।
मैं दौड़कर आता हू , और पूछता हु । क्या बात है पिताजी ?
पिताजी - तूझे पता नहीं है, आज तेरी बहन आ रही है ? वह इस बार हम सभी के साथ अपना जन्मदिन मनायेगी ।
अब जल्दी से जा और अपनी बहन को लेके आ,हाँ और सुन... तू अपनी नई गाड़ी लेकर जा जो तूने कल खरीदी है... उसे अच्छा लगेगा
मैं - लेकिन मेरी गाड़ी तो मेरा दोस्त ले गया है सुबह ही... और आपकी गाड़ी भी ड्राइवर ये कहकर ले गया कि गाड़ी की ब्रेक चेक करवानी है।
पिताजी - ठीक है तो तू स्टेशन तो जा किसी की गाड़ी लेकर या किराया की करके ? उसे बहुत खुशी मिलेगी ।
मै - अरे वह बच्ची है क्या जो आ नहीं सकेगी? आ जायेगी आप चिंता क्यों करते हो कोई टैक्सी या आटो लेकर----
पिताजी - तूझे शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए? घर मे गाड़ियाँ होते हुए भी घर की बेटी किसी टैक्सी या आटो से आयेगी?
मैं - ठीक है आप जाओ मुझे बहुत काम है मैं जा नहीं सकता ।
पिताजी - तूझे अपनी बहन की थोड़ी भी फिकर नहीं? शादी हो गई तो क्या बहन पराई हो गई ? क्या उसे हम सबका प्यार पाने का हक नहीं? तेरा जितना अधिकार है इस घर में , उतना ही तेरी बहन का भी है। कोई भी बेटी या बहन मायके छोड़ने के बाद पराई नहीं होती।
मैं - मगर मेरे लिए वह पराई हो चुकी है और इस घर पर सिर्फ मेरा अधिकार है ।
तडाक ...... तडाक.....
अचानक पिताजी का हाथ उठ जाता है मुझपर और तभी माँ आ जाती है ।
मम्मी - आप कुछ शरम तो कीजिए ऐसे जवान बेटे पर हाँथ बिलकुल नहीं उठाते।
पिताजी - तुमने सुना नहीं इसने क्या कहा ? अपनी बहन को पराया कहता है ये वही बहन है जो इससे एक पल भी जुदा नहीं होती थी- हर पल इसका ख्याल रखती थी। पाकेट मनी से भी बचाकर इसके लिए कुछ न कुछ खरीद देती थी। बिदाई के वक्त भी हमसे ज्यादा अपने भाई से गले लगकर रोई थी। और ये आज उसी बहन को पराया कहता है।
मैं - (मुस्कुराकर) "बुआ का भी तो आज ही जन्मदिन है ना पापा" वह कई बार इस घर मे आई है "मगर हर बार अॉटो से आई है ".आपने कभी भी अपनी गाड़ी लेकर उन्हें लेने नहीं गये....
माना वह आज वह तंगी मे है मगर कल वह भी बहुत अमीर थी । आपको मुझको इस घर को उन्होंने दिल खोलकर सहायता और सहयोग किया है। बुआ भी इसी घर से बिदा हुई थी फिर रश्मि दी और बुआ मे फर्क कैसा। रश्मि मेरी बहन है तो बुआ भी तो आपकी बहन है।
"पापा" आप मेरे मार्गदर्शक हो आप मेरे हीरो हो मगर बस इसी बात से मैं हरपल अकेले में रोता हूँ। की..तभी बाहर गाड़ी रूकने की आवाज आती है.... ।
तब तक पापा भी मेरी बातों से पश्चाताप की आग मे जलकर रोने लगे और इधर मैं भी कि दीदी दौड़कर पापा मम्मी से गले मिलती है..लेकिन उनकी हालत देखकर पूछती है कि क्या हुआ पापा ?
पापा - तेरा भाई आज मेरा भी पापा बन गया है ।
रश्मि - ए पागल... !! नई गाड़ी न? बहुत ही अच्छी है मैंने ड्राइवर को पीछे बिठाकर खुद चलाके आई हूँ और कलर भी मेरी पसंद का है।
मैं - "happy birthday to you Di..."
वह गाड़ी आपकी है और हमारे तरफ से आपको "birthday gift.."!
बहन सुनते ही खुशी से उछल पड़ती है कि तभी "बुआ" भी अंदर आती है
बुआ - क्या भैया आप भी न ? न फोन न कोई खबर , अचानक भेज दी गाड़ी आपने, भागकर आई हूँ खुशी से "ऐसा लगा कि पापा आज भी जिंदा हैं .."
इधर पिताजी अपनी पलकों मे आँसू लिये मेरी ओर देखते हैं..और मैं पापा को चुप रहने का इशारा करता हु ।
इधर बुआ कहती जाती है कि मैं कितनी भाग्यशाली हूँ । कि "मुझे बाप जैसा भैया मिला," ईश्वर करे मुझे हर जन्म मे आप ही भैया मिले...
"पापा -मम्मी को पता चल गया था कि..ये सब प्रिंस की करतूत है,मगर आज फिर एक बार रिश्तों को मजबूती से जुड़ते देखकर वह अंदर से खुशी से टूटकर रोने लगे। उन्हें अब पूरा यकीन था कि...मेरे जाने के बाद भी मेरा बेटा रिश्तों को सदा हिफाजत से रखेगा..
"बेटी और बहन"
ये दो बेहद अनमोल शब्द हैं जिनकी उम्र बहुत कम होती है । क्योंकि शादी के बाद बेटी और बहन किसी की पत्नी तो किसी की भाभी और किसी की बहू बनकर रह जाती है। शायद.... लड़कियाँ इसी लिए मायके आती होंगी कि...
उन्हें फिर से "बेटी और बहन" शब्द सुनने को बहुत मन करता होगा !!
गुरुवार, 13 अप्रैल 2023
अपनी तुलना दूसरों से न करें"
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एक बार की बात है, किसी जंगल में एक कौवा रहता था, वो बहुत ही खुश था, क्योंकि उसकी ज्यादा इच्छाएं नहीं थीं। वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट था, लेकिन एक बार उसने जंगल में किसी हंस को देख लिया और उसे देखते ही सोचने लगा कि ये प्राणी कितना सुन्दर है, ऐसा प्राणी तो मैंने पहले कभी नहीं देखा! इतना साफ और सफेद। यह तो इस जंगल में औरों से बहुत सफेद और सुंदर है, इसलिए यह तो बहुत खुश रहता होगा।
कोवा हंस के पास गया और पूछा, भाई तुम इतने सुंदर हो, इसलिए तुम बहुत खुश होगे?
इस पर हंस ने जवाब दिया, हां मैं पहले बहुत खुश रहता था, जब तक मैंने तोते को नहीं देखा था। उसे देखने के बाद से लगता है कि तोता धरती का सबसे सुंदर प्राणी है। हम दोनों के शरीर का तो एक ही रंग है लेकिन तोते के शरीर पर दो-दो रंग है, उसके गले में लाल रंग का घेरा और वो सूर्ख हरे रंग का था, सच में वो बेहद खूबसूरत था।
अब कौवे ने सोचा कि हंस तो तोते को सबसे सुंदर बता रहा है, तो फिर उसे देखना होगा।
कौवा तोते के पास गया और पूछा, भाई तुम दो-दो रंग पाकर बड़े खुश होगे?
इस पर तोते ने कहा, हां मैं तब तक खुश था जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था। मेरे पास तो दो ही रंग हैं लेकिन मोर के शरीर पर तो कई तरह के रंग हैं।
अब कौवे ने सोचा सबसे ज्यादा खुश कौन है, यह तो मैं पता करके ही रहूंगा। इसलिए अब मोर से मिलना ही पड़ेगा। कौए ने मोर को जंगल में ढूंढा लेकिन उसे पूरे जंगल में एक भी मोर नहीं मिला और मोर को ढूंढते-ढूंढते वह चिड़ियाघर में पहुंच गया, तो देखा मोर को देखने बहुत से लोग आए हुए हैं और उसके आसपास अच्छी खासी भीड़ है।
सब लोगों के जाने के बाद कौवे ने मोर से पूछा, भाई तुम दुनिया के सबसे सुंदर जीव हो और रंगबिरंगे हो, तुम्हारे साथ लोग फोटो खिंचवा रहे थे। तुम्हें तो बहुत अच्छा लगता होगा और तुम तो दुनिया के सबसे खुश जीव होगे?
इस पर मोर ने दुखी होते हुए कहा, भाई अगर सुंदर हूं तो भी क्या फर्क पड़ता है! मुझे लोग इस चिड़ियाघर में कैद करके रखते हैं, लेकिन तुम्हें तो कोई चिड़ियाघर में कैद करके नहीं रखता और तुम जहां चाहो अपनी मर्जी से घूम-फिर सकते हो। इसलिए दुनिया के सबसे संतुष्ट और खुश जीव तो तुम्हें होना चाहिए, क्योंकि तुम आज़ाद रहते हो। कौवा हैरान रह गया, क्योंकि उसके जीवन की अहमियत कोई दूसरा बता गया।
दोस्तों, ऐसा ही हम लोग भी करते हैं। हम अपनी खुशियों और गुणों की तुलना दूसरों से करते हैं, ऐसे लोगों से जिनका रहन-सहन का माहौल हमसे बिलकुल अलग होता है। हमारी जिंदगी में बहुत सारी ऐसी चीज़ें होती हैं, जो केवल हमारे पास हैं, लेकिन हम उसकी अहमियत समझकर खुश नहीं होते। लेकिन दूसरों की छोटी ख़ुशी भी हमें बड़ी लगती है, जबकि हम अपनी बड़ी खुशियों को इग्नोर कर देते हैं।
सोमवार, 10 अप्रैल 2023
सम्मान की इच्छा
एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे ।
रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु, एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?
श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो ।
तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?
यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को उन्हीने सोने का बना दिया और बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो ।
अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया ।
उसने सभी गाँव वालों को बुलाया और सोना बांटना शुरू कर दिया।
गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी ।
अर्जुन, सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए ।
लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।
गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे । इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे ।
जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी ।
उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।
प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण को बुला लिया और उससे कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो ।
कर्ण ने पहाड़ की तरफ देखा। गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा, यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये । ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए ।
यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया ?
इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि,"तुम्हे सम्मान प्राप्त करने की इच्छा के कारण, तुम स्वयं पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था।
दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए ।
वह नहीं चाहते थे कि उनके मन में यह इच्छा नहीं थी कि कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे।
उनके पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।
सार :-
दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है ।
यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के साथ करना चाहिए।
अपना काम स्वयं करिए
एक बुद्धिमान लवा पक्षी का परिवार किसान के खेतों में रहता था। उनका घोंसला बहुत आरामदेह था। परिवार में सभी सदस्यों में अथाह प्रेम था
एक सुबह अपने बच्चों के लिए भोजन की तलाश में जाने से पहले बच्चों की मां ने कहा- देखो बच्चों किसान बहुत जल्दी अपनी फसल काट कर आएगा। ऐसी स्थिति में हमें अपना नया घर खोजना पड़ेगा। तो तुम सब अपने कान और आंखें खुली रखना और जब मैं शाम को लौटकर आऊं तो मुझे बताना कि तुमने क्या देखा और क्या सुना?
शाम को जब लवा अपने घर लौटी तो उसने अपने परिवार को परेशान हाल में पाया। उसके बच्चे कहने लगे- हमें जल्दी ही यह स्थान छोड़ देना चाहिए। किसान अपने पुत्रों के साथ अपने खेत की जांच करने आया था। वह अपने पुत्रों से कह रहा था। फसल तैयार है, हमें कल अपने सभी पड़ोसियों को बुलाकर फसल काट लेनी चाहिए।
लवा ने अपने बच्चों की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं, फिर बोली- अरे कोई खतरा नही। कल भी होशियार रहना। किसान जो कुछ करे या कहे, वह मुझे शाम को बताना।
दूसरे दिन शाम को जब लवा वापस लौटी तो उसने अपने बच्चों को बहुत भयभीत पाया। मां को देखते ही वे चिल्लाए- किसान दुबारा यहां आया था। कह रहा था, यह फसल जल्दी ही काटी जानी चाहिए। अगर हमारे पड़ोसी हमारी सहायता नहीं करते तो हम अपने रिश्तेदारों को बुलाएंगे। जाओ, अपने चाचा और चचेरे भाइयों आदि से कहो कि कल आकर फसल काटने में हमारी सहायता करें।
लवा मुस्कराई बोली- प्यारे बच्चों चिन्ता मत करो। किसान के रिश्तेदारों के पास तो उनकी अपनी ही फसल काटने के लिए पड़ी है। वे भला यहां फसल काटने क्यों आएंगे।
अगले दिन लवा फिर बाहर चली गई। जब वह शाम को लौटी तो बच्चे उसे देखते ही चिल्लाए- ओह मां यह किसान आज कह रहा था कि यदि उसके रिश्तेदार और पड़ोसी फसल काटने नहीं आते तो वह खुद अपनी फसल काटेगा। तो अब तो यहां रहने का कोई लाभ नहीं है।
तब तो हमें शीघ्र ही यहां से चलना चाहिए। लवा बोली- यह मैं इसलिए कह रही हूं कि जब कोई किसी कार्य के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह कार्य कभी पूरा नहीं होता। परंतु वही व्यक्ति जब उस कार्य को स्वयं करने की ठान लेता है तो संसार की कोई भी शक्ति उसे उस कार्य को करने से नहीं रोक सकती। तो यही वह समय है,जब हमें अपना घर बदल लेना चाहिए।
शिक्षा- यदि अपना काम स्वयं करने की आदत खुद में विकसित कर लें,तो हर क्षेत्र में सफलता की उम्मीद रहेगी.
शनिवार, 2 अक्टूबर 2021
Birthday Gift | जन्मदिन का उपहार | A Short Story | Motivational Story
Heart touching. Must read
जन्मदिन का उपहार
मैं सुचित्रा, आज मेरा जन्मदिन है।
सचिन ने सुबह ही कहा :- "आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे। तुम्हारे जन्मदिन पर आज तुम्हें एक अनोखी ट्रीट मिलेगी।"
15 साल हो गए हमारी शादी को। मैं सचिन को बहुत अच्छे से जानती हूँ। दोनों बच्चे शाम 4 बजे स्कूल से लौटेंगे यानी लंच पर मैं और सचिन ही जाएँगे और बच्चों के आने से पहले लौट भी आएँगे।
एक नए बने मॉल की पार्किंग में हमारी गाड़ी पहुँची।
5वी मंजिल पर खाने पीने के ढेरों स्टॉल्स थे फाइनली एक बंद द्वार पर हम पहुँचे। द्वार पर एक बोर्ड लगा था, जिसपर लिखा था : “Dialogue in the dark”
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। "अंधेरे में संवाद"? ये कैसा नाम है, रेस्टॉरेंट का?
बड़ा विचित्र लग रहा था सब कुछ। अगले मोड़ के बाद इतना अंधेरा हो गया कि, मैंने सचिन का हाथ पकड़ लिया और फिर शायद हम एक हॉल में पहुँचे।
एक सूटबूट धारी आदमी ने किसी को आवाज लगाई :- "संपत।"
“ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। आज मैडम का बर्थडे है। गिव देम स्पेशल ट्रीट। ऑर्डर मैंने ले लिया है, तुम इन्हें इनकी टेबलपर लेकर जाओ। अब उस दूसरे आदमी संपत ने हमारे हाथ थामे और हमें टेबल पर पहुँचाया। हम बैठ गए। मैंने सामने टेबल पर हाथ फिराया। जब टेबल ही नहीं दिख रहा तो खाना कैसे दिखेगा? हम खाना कैसे खाएँगे? ये कैसा जन्मदिन का उपहार है? ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे दिमाग में घुमड़ रहे थे। लेकिन मुझे सचिन पर भरोसा था फिर टेबल पर प्लेट्स आदि सजाए जाने की आवाजें आने लगीं। वेटर्स का आना जाना समझ में आ रहा था। फिर वो प्लेट्स में खाना सर्व करने लगा।
"मैंने परोस दिया है। अब आप लोग शुरू कीजिए। आपको कुछ दिखेगा नहीं लेकिन मुझे विश्वास है कि, स्पर्श और खुशबू से आपको खाने में एक अलग ही आनंद प्राप्त होगा।"
उस घनघोर अंधेरे में मैंने रोटी तोड़ी, प्लेट में रखी सब्जी को लपेटा और पहला निवाला लिया। उल्टे हाथ से मैंने प्लेट पकड़ी हुई थी अतः प्रत्येक पदार्थ की जगह सीधे हाथ के स्पर्श से मुझे ज्ञात हो रही थी।
और फिर, आहा... अंधेरे में भी खाने के पदार्थ तो अपने स्वाद का मजा दे ही रहे थे लेकिन साथ ही मैं पूछ रही थी और ऐसे ही सचिन मुझसे पूछता जा रहा, खुशबू, स्पर्श और आवाज बस यही काम कर रहे थे। बीच बीच में संपत, सब्जियाँ या अन्य कुछ और परोस देता। मेरा जन्मदिन, अंधेरे में लंच, एक अनोखा आनंद दे गया कैंडल लाइट डिनर से भी अधिक आनंददायक रहा।
"आप जब, बाहर जाना चाहें तो बताइएगा। मैं आपको बाहर छोड़ आऊँगा।" ---संपत ने कहा। तो सचिन बोल पड़ा : "हाँ.... हाँ.... अब चलो। बिल भी तो बाहर ही पे करना है। चलो संपत, ले चलो हमें।" फिर संपत ने हम दोनों के हाथ थामे और हमें बाहर को ले चला। अंधेरे हॉल से बाहर निकल हमें दो मोड़ों के बाद प्रकाश दिखने लगा और हम संपत का हाथ छोड़ उसके पीछे चलते रहे।
उसका आभार मानने के लिए मैंने उसे आवाज लगाई तो संपत पलटा और मेरी ओर देखने लगा। तब कमरे के प्रकाश में मैंने संपत का चेहरा देखा और मेरे मुँह से हल्की चीख निकल गई क्योंकि, संपत की आँखों की जगह दो अंधेरे गढ्ढे नजर आ रहे थे। वो पूर्ण रूप से अँधा था।
संपत बोला :- “यस मैडम?”
मैं समझ नहीं पा रही थी कि,क्या कहूँ? फिर मैंने कहा :- "संपत, अपनी ऐसी हालत में भी तुमने, हमारी खूब सेवा, इतनी बढ़िया खातिरदारी की। मैं ये बात सारी जिंदगी नहीं भूलूँगी।"
संपत :- "मैडम, आपने जिस अंधेरे को आज अनुभव किया है वो तो हमारा रोज का ही है। लेकिन हमने उसपर विजय पा ली है। We are not disabled, we are differently able people. We can lead our life without any problem with all joy and happiness as you enjoy.”
बिना किसी की सहानुभूति के मोहताज एक सशक्त व्यक्ति से आज सचिन ने मुझे मिलवाया। ऐसा जन्मदिन मुझे कभी नहीं भूलेगा।
सचिन बिल देकर मेरे पास आया हमेशा सचिन को उसकी फिजूलखर्ची के चिल्लाने वाली मैंने, बिल को देखा तो मेरी नजर बिल पर सबसे नीचे लिखे प्रिंटेड शब्दों पर ठहर गई.......
लिखा था : We do not accept tips, Please think of donating your eyes, which will bring light to somebody’s life.
(हम टिप्स स्वीकार नहीं करते। कृपया अपने नेत्रदान के बारे में सोचें, जो किसी के जीवन में रोशनी ले आएगा।)
नेत्रदान महादान
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